भूखी लोमड़ी और चरवाहे – Bhukhi Chalak Lomdi Aur Charwahe

चालाक लोमड़ी – (Chalak Lomdi)

एक जंगल में बहुत दूर एक बढ़िया चरागाह था। चरवाहे अपने जानवरों को लेकर वंही पर घास चराने लाते थे। जब भेड़ें घास चरती, तो चरवाहे बैठकर एक – दूसरे को कहानियाँ सुनाते या कोई खेल खेलते रहते थे।

चरवाहो को अपने जानवरों के साथ पूरा वंही बिताना होता था, इसलिए वे अपने साथ अपना – अपना भोजन भी लाते थे।

चरवाहो के सामने अपना खाना सुरक्षित रखने की समस्या थी।  वे जानते थे की अगर उन्होंने किसी ऐसे – वैसे जगह अपना खाना रख दिया, तो जंगली जानवरों को पता लग जाएगा और वे उसे खा जाएंगे।

चरवाहे  खाना रखने के लिए किसी सुरक्षित जगह की तलाश कर रहे थे, ताकि भूख लगने पर वे सब एक साथ बैठकर खाना  सकें। पुरे चरागाह में तलाश करते – करते वे बिलकुल किनारे पर आ गए। फिर चरवाहों को एक पेड़ मिला, जिसके तने में बहुत बड़ी खोह थी।  हालांकि खोहे का मुँह काफी संकरा था लेकिन उसमें से एक आदमी पेड़ के तने के अंदर घुस सकता था।

चरवाहों ने तय  किया की पेड़ का खोखला तना उनका खाना रखने के लिए सबसे अच्छी जगह रहेगा।  वंहा कोई भी जंगली जानवर नहीं पहुँच सकेगा और उन सभी का खाना सुरक्षित रहेगा।

इसके बाद, सभी चरवाहे सुबह चरागाह में इकठे होते और अपनी भेड़ों को चरने के लिए छोड़ देते और भेड़ों को छोड़ने के बाद उसी पेड़ के खोखले तने में अपना भोजन छिपा देते।  फिर सभी मजे से आपस में मिलकर खेलते रहते।

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भूखी लोमड़ी और चरवाहे  – Bhukhi Chalak Lomdi Aur Charwahe

एक दिन, एक भूखी लोमड़ी उस जंगल से निकली, बेचारी लोमड़ी को कई दिनों से खाना नहीं मिला था। वह खाने की तलाश में इधर – उधर भटक रही थी।  भूख के कारण वह सूखकर पतली हो गई थी।  उसकी हड्डिया दिखाई देने लगी थी।

जब वह लोमड़ी चरागाह के पास से गुजर रही थी  तो उसे स्वादिस्ट भोजन की गंध आई, लोमड़ी बिना समय गंवाए उसी पेड़ के पास पहुँच गई, जंहा चरवाहों ने अपना भोजन रखा था।  वह खाने के लिए लपक पड़ी।

पेड़ के पास पहुंचकर उसे पता चला की चरवाहों ने तो अपना भोजन बहुत चतुराई से छिपाकर रखा है।  लोमड़ी को कई दिनों से खाने को नहीं मिला था, इस वजह से वह काफी दुबली हो गई थी।  दुबली होने के कारण वह पेड़ की संकरी खोह में आसानी से घुस गई और खोखले तने में पहुँच गई।

चरवाहों को पता नहीं चला की पेड़ के तने में Chalak Lomdi  घुसी हुई है और मजे से उन सभी का भोजन चाट किये जा रही है।  लोमड़ी तो बस खाये जा रही थी, खाये जा रही थी।

कुछ ही देर में लोमड़ी पेड़ के तने में छिपा हुआ सारा खाना खा गई और उसका पेट पूरा भर गया।  लोमड़ी संतुस्ट हो चुकी थी। उसने सोचा की चरवाहों के आने से पहले अब उसे निकल जाना चाहिए।

लेकिन अफ़सोस की उसने इतना ज्यादा खा लिया था की अब वह दुबली नहीं रह गई थी।  उसने बहुत कोशिश की लेकिन वह उस संकरी खोह से बाहर नहीं निकल पाई।

जब वह तने में घुसी थी, तब तो वह दुबली थी, इसलिए उसे घुसने में कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन अब जमकर खाना खाने के बाद वह मोटी हो चुकी थी और अब उसका बाहर निकल पाना असंभव था। बेचारी लोमड़ी फंसकर रह गई। वह तने के अंदर बैठकर प्राथना करने लगी की चरवाहे आकर उसकी पिटाई न करें।

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