“तीसरी मंज़िल”
“अगर कोई जगह 9 बार किराए पर दी जाए और हर बार कोई न कोई गायब हो जाए, तो क्या दसवां किरायेदार बनना समझदारी है?”
1. शुरुआत – एक नया ठिकाना
आरव मिश्रा, 32 साल का एक ग्राफिक डिज़ाइनर, दिल्ली की भीड़-भाड़ और शोर से तंग आकर एक छोटे शहर रामनगर में शिफ्ट होता है। उसे काम घर से ही करना होता है, तो वह शांति चाहता था।
रामनगर के पुराने हिस्से में एक मकान था, जिसका तीसरा फ्लोर किराए पर खाली था। किराया बेहद सस्ता, लेकिन मालिक ने सिर्फ एक बात कही:
“तीसरी मंज़िल पर अकेले रहना पड़ेगा। वहां कोई नहीं आता… और कोई आता भी है, तो रुकता नहीं।”
आरव को यह बात मज़ाक लगी। वो जगह देखी – खुला, हवादार, शांत – और तुरंत हाँ कर दी।
2. पहली रात – अजीब सी खामोशी
पहली रात सब कुछ सामान्य था। लेकिन जैसे ही घड़ी रात के 2:33 पर पहुँची, आरव की नींद खुल गई। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
“कौन है?” – कोई जवाब नहीं।
वह बाहर गया – सीढ़ियाँ, बरामदा, सब खाली।
लेकिन लौटते समय उसने देखा – दीवार पर एक नाम लिखा था: “दीपा” – जैसे किसी ने नाखून से खरोंचकर लिखा हो।
आरव ने दीवार पेंट कर दी और सो गया।
3. अजीब पड़ोसी और पुरानी फाइलें
नीचे वाले फ्लोर पर रहने वाली शिवानी आंटी ने आरव को चाय पर बुलाया।
बातों-बातों में उन्होंने कहा:
“बेटा, तीसरी मंज़िल पर कौन है अब?”
“मैं हूँ,” आरव ने हँसकर कहा।
“फिर तो तुम भी ज़्यादा दिन नहीं टिकोगे।”
उन्होंने बताया कि पिछले 9 किरायेदार या तो गायब हो गए या पागल हो गए। पुलिस को कुछ नहीं मिला।
आरव को यकीन नहीं हुआ। लेकिन उसी रात उसने छत के स्टोर में कुछ पुरानी फाइलें खोज निकालीं — जिनमें एक-एक किरायेदार का नाम, फोटो, और गायब होने की तारीख थी।
हर फाइल के अंत में एक ही शब्द लिखा था:
“2:33”
4. सवाल उठते हैं…
आरव ने खुद से पूछा:
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2:33 ही क्यों?
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दीपा कौन थी?
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क्या सभी घटनाएं एक जैसी हैं?
वह खुद ही रिसर्च करने में जुट गया। उसे पता चला कि 7 साल पहले, उसी फ्लोर पर दीपा नाम की एक लड़की ने आत्महत्या की थी। कारण? उसका प्रेमी उसे धोखा देकर चला गया था।
उसके बाद से हर किरायेदार को किसी ना किसी औरत की परछाईं दिखती थी – बाल बिखरे, आँखें सुनी-सुनाई आवाज़ों से भरी हुईं।
5. आरव की जिज्ञासा और डर की शुरुआत
एक रात, आरव ने एक प्रयोग किया।
वह 2:33 पर पूरे फ्लोर पर GoPro कैमरे सेट कर सो गया।
सुबह जब वीडियो देखा, तो उसमें यह दिखा:
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आरव सो रहा है।
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एक परछाईं दीवार से निकलती है।
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उसके कान में कुछ कहती है।
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और दीवार पर खून से फिर से लिखा गया है: “दीपा”
आरव चीख पड़ा।
6. दीपा का सवाल और पहला जवाब
अगली रात, आरव नींद में बड़बड़ाने लगा। उसकी आवाज़ रिकॉर्डिंग में कैद हुई:
“तू मुझे समझ नहीं सका… वो भी नहीं समझा…”
“क्या तुम भी मुझे छोड़ दोगे?”
आरव ने जवाब दिया — नींद में ही —
“नहीं दीपा, मैं सुन रहा हूँ… बताओ क्या हुआ था?”
तभी रिकॉर्डिंग बंद हो गई। और बिजली चली गई।
7. कहानी में मोड़ (Twist)
आरव ने घर के फर्श को खुरचा, क्योंकि उसे लग रहा था कि वहाँ कुछ छिपा है।
वहां एक छोटा लकड़ी का बॉक्स मिला – अंदर एक डायरी, जिसमें दीपा की हैंडराइटिंग थी।
डायरी में लिखा था:
“मैंने उसे सब कुछ दिया, और उसने मुझे धोखा दे दिया। मैं नहीं मरी… मैं बंद हो गई हूँ। अब जब कोई मेरे कमरे में रहता है, मैं जागती हूँ… ताकि कोई मुझे सुने। मुझे सुकून चाहिए।”
और अंतिम पंक्ति:
“जो मेरा दर्द समझ ले, वही मुझे मुक्ति दे सकता है।”
8. आरव का सामना
आरव ने उस रात तय किया कि वह दीपा से बात करेगा। उसने कमरे में दिया जलाया, और दीपा की डायरी पढ़कर उसका नाम पुकारा।
कमरे का तापमान गिर गया। खिड़कियाँ बंद हो गईं। दीवार से परछाईं निकल कर सामने खड़ी हो गई।
बाल उलझे हुए, आँखें रोती हुईं, पर चेहरा शांत।
दीपा: “तुम क्यों रुके हो यहाँ?”
आरव: “क्योंकि मैं सुनना चाहता हूँ।”
दीपा: “क्या तुम मेरा दर्द समझ सकोगे?”
आरव: “शायद नहीं… पर मैं कोशिश कर सकता हूँ।”
तभी दीपा की आत्मा रो पड़ी। दीवारों पर लिखा मिट गया। और एक धीमा-सा प्रकाश पूरे कमरे में फैल गया।
9. आरव की नई सुबह
अगली सुबह पहली बार 7 साल में किसी ने तीसरी मंज़िल पर आरव को खिड़की खोलते देखा।
शिवानी आंटी ऊपर आईं –
“बेटा, तुम अब भी हो?”
“हाँ आंटी… दीपा अब चली गई।”
“तुमने कैसे किया ये?”
“मैंने सिर्फ सुना… और जवाब दिया।”
10. अंतिम सवाल और उत्तर:
सवाल: क्या आत्मा हमेशा डरावनी होती है?
उत्तर: नहीं, कभी-कभी वो सिर्फ सुनी जाना चाहती हैं।
कहानी का सारांश (Summary):
“तीसरी मंज़िल” एक ऐसी आत्मा की कहानी है जो बदले के लिए नहीं, बस समझे जाने के लिए अटकी हुई थी। आरव ने डरने के बजाय संवाद किया और वो सुकून दे पाया जो पिछले कोई किरायेदार नहीं दे सका।
इस कहानी में डर सिर्फ माहौल का हिस्सा है, असली डर है अकेलेपन का, और असली मुक्ति है सुनने और समझने में।